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आखिर क्यूँ

माना बलिष्ठ है पुरूष,स्त्री की उससे समानता नहीं है, पर स्त्री पुरूष की दासी नहीं है , स्त्री को सुरक्षा भरा घेरा चाहिए, पुरूष सुरक्षा देने से करता है इनकार, उलटे करता है उसकी अस्मिता में प्रहार , क्यूँ?? महिला दिवस तब तक है बेकार, जब तक महिलाओ पर होगा अत्याचार ...                                                           ... ...  mamta

मज़हब

मैने हिन्दू के घर जनम लिया तो हिन्दू हो गयी , मुसलमान के घर लेती तो मुसलमान हो जाती, आज रामायण है तब हाथ में कुरान आ जाती, मंदिर के घंटो की जगह मुझे अजान की आवाज़ भाती , जो धर्म सिखाता है इंसान वही बन जाता है , आत्मा तो वही है बस नाम बदल जाता है

My Art Work (Creativity )

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                           मैं थी ,मैं हूँ ,मैं रहूंगी      (oil painting made with clay and  paper mache) --------------------------------------------------------------------------------------- 'Eternal Love of Radha Krishna'   OIL PAINTING  ------------------------------------------------------------------------ इंतज़ार  ------------------------------------------------------------------------------- - ------------------------------------------------------------------------------------------------- My sketch and lines dedicated to all mothers of this earth.. माँ अनंत है,माँ अनादि है ,केवल एक अध्याय नहीं है, इस सृष्टि मे माँ से बढ़कर ,दूजा कोई पर्याय नहीं है.... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------- A real frien...

Clicking with nature..

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                                                        “ With each sunrise, we start anew " :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::                       Even the most beautiful days eventually have their sunsets........                            ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::                                  In order to see birds it is necessary to become a part of the silence.               ...

आज कुछ नया करें....

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सुबह से शाम , शाम से सुबह , यूँ ही बेवजह सी बीत रही है ज़िन्दगी ........... घडी की सुईयों के साथ  गोल गोल घूमती, बिना रफ़्तार की गाड़ी  सी चलती जा रही है ज़िन्दगी ....... आटा ,दाल ,नमक ,तेल  की चिंता में महीने दर महीने  खत्म हो रही है जिंदगी...... चलो आज कुछ नया करें , प्रकृति से उधार ले लें..... एक टुकड़ा आसमान, स्वछन्द उड़ान भरने के लिए .. एक ताज़ी हवा का झोंका .. अपनी प्रदूषित सांसो को मह्काने के लिए.... थोड़े से रंग इन्द्रधनुष के, अपनी बदरंग जिंदगी को  सतरंगी बनाने  के लिए... फूलों से थोडा मधुरस , अपने अंदर की कड़वाहट में फिर मिठास भरने के लिए.. तितली की चंचलता, बच्चे की तरह रूठ गयी अपनी मुस्कराहट को गुदगुदाने के लिए ... सुनहरी धूप, अपने अंतर्मन को प्रकाशमय करने के लिए... विहंगों  के कलरव, नदी की कलकल , उबती जिंदगी को मधुर संगीत की लय देने के लिए... पता है आप कहेंगे , इन सबसे घर नहीं चलता, पर ये जरूरी हैं, अपनी मर रही संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए ..... ..............................................

फिर आया नया साल

अपनी बंद रहस्य मयी पंखुड़ियों को धीरे धीरे खोल मुस्कुराने को है एक और नयी सुबह का फ़ूल आशीर्वाद सा झरेगा स्वर्णिम पराग और नयी नयी कोपलों सी फिर जनम लेगी आशाएं . रेशमी पंखुड़ियों के कस्तूरी स्पर्शों से पुछ जायेगें शबनमी आंसू और हर शाख पर फ़ूलेगी मुसकानें नयी उमंगो की चलो भर कर अंजुरी में विश्वास चढायें अर्ध्य नव वर्ष के चढते सूरज को.. आज फ़िर उड़ेगी सम्भा्वनाओं की धूल मुस्कुराने को है एक और नयी सुबह का फूल ....

wish...

एक  दिन  मैं पर्वत बन जाउंगी .... अविचलित,अखंड , आकर्षक .... आसमान को छूते पर्वत  ... और .. आसमान से सितारे  चुराकर धीरे धीरे प्यार से बिखरा दूंगी प्यासी धरती मे......