Friday, December 30, 2016

अभिनंदन नव वर्ष ....

अपनी बंद रहस्यमयी पंखुड़ियों को खोल,
 एक बार फिर खिलने को है नववर्ष का फ़ूल ।

    एक बार फिर उगेंगे कल्पनाओं के पंख,
     एक बार फिर सजेंगे नव संकल्पों के दीप।

 पतझड़ के पीले पत्तों से झड़ जायेंगे सारे दुःख ,
नयी कोपलों सी फिर जन्म लेगी आशाएं ।

    सतरंगी पंखुड़ियों में खो जायेगें गम के आंसू,
  ओस की बूदों सी चमकेंगी मुसकानें नयी उमंगो की।

 चलो भर कर मन में फिर एक विश्वास नया,
करें अभिनन्दन नव वर्ष के चढते सूरज का ।

स्नेह और आत्मियता बरसेगी पुरानी रंजिशों को भूल,                        एक बार फिर खिलने को है नववर्ष का फूल।

                           ममता
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Monday, June 27, 2016

मुझे भूलना नहीं ....

टेढ़ी मेढ़ी कच्ची पगडंडियां से नीचे उतरते ही ,  
आँखों से ओझल होते जाते हैं खेत,खलिहान ,
और डामर वाली पक्की चौड़ी सड़क ,
ले जाती है गाँव से दूर मुझे शहरों की ओर,
बेहतर जीवन की लालसा में 
पर जिंदगी की जद्दोजहद के बीच  ,
अक्सर पुकारता है  गाँव मेरा ,
'मुझे भूलना नहीं ' याद दिलाता हुआ सा .....

गाँव के सिराहने सिराहने जंगल की हरीतिमा ,
बाखलियों से नीचे नदी तक ढलानों में खेत ,
आढू खुमानी से लदे हुए पेड़ ,
छतों मैं फैली कद्दू ककड़ियों की बेल ,
खेतों में घुटनों घुटनों लहलहाता गेहूं  ,
चीड़ देवदार और बांज के  जंगल  ,
अक्सर याद आते हैं मुझे,
तिमील, बुरांस और काफल ......

घाघरे और चोली में रंग बिरंगी गोट ,
कमर में बंधा हुआ धोती का फेंटा,
माथे में पिठियाँ अक्षत ,लाल टिकुली ,
गले मैं  गुलुबन्द ,हाथ में दराती,
बांज और गाज्यो  काटती ,
गीतों की धुन से जंगल गुंजाती ,
अक्सर याद आती हैं मुझे 
आमा ,काकी, जड़जा और बोजी ......

भट का जौला ,लहसुन हरी धनिया का नमक,
घौत की दाल और भांग की चटनी ,
हरी पालक और लायी का टपकिया,
आलू के गुटके , ककड़ी का रायता,
गडेरी की सब्जी ,जम्बू से छोंकी हुयी  दाल,
सना हुआ नींबू , ऊखल कुटे चावलों का भात ,
अक्सर याद आता है ,
मुझे नौले के मीठे ठन्डे पानी का स्वाद .......

ऐपण से सजे दरवाज़े ,ऊपर दशहरे का छापा.
दूर दूर चरती कुछ  गाय और बकरियां ,
नदी  की कल-कल, जंगल की सन-सन
मिटटी की खुशबु, पत्तों का संगीत ,
जाड़ों की खिली हुयी गुनगुनी धूप ,
हिमालय की चोटियों में बर्फ की चादर ,
अक्सर याद आते हैं मुझे ,
घाटियों से उठते कोहरे के बादल .....

 जिंदगी की जद्दोजहद के बीच ,
अक्सर पुकारता है  गाँव मेरा ,
'मुझे भूलना नहीं  ' याद दिलाता हुआ सा ......
.............................................................ममता 

 १ बाखलियों ( गाँव के कुछ घरों का समूह )

२  गाज्यो  (हरी घास) 

३  पिठियाँ अक्षत (माथे पर लगायी गयी हल्दी से बनी लाल रोली और चावल )

 ४ जड़जा (ताई ) 

५ बोजी  (भाभी)  
६ एपण (लाल मिटटी और चावल के आटे से देहरी में  बनी रंगोली )




Thursday, February 4, 2016

पहाड़ी औरत .............

उम्मीदों का थामे हाथ ,
सुबह घर से निकलती हूँ ....

लकड़ी चुनती, चारा ,पानी ढोती ,

दिन भर दुर्गम चट्टानों से लडती हूँ ....

बुवाई करती ,कटाई करती ,

अपने श्रमगीतों से बियावान पहाड़ों को जगातीं हूँ ....

गुनगुनाती हुयी कोई पहाड़ी गीत ,

डूबते सूरज के साथ थकी सी लौट आती हूँ ....

इसी तरह पता नहीं कब होती है सुबह ,                                                                           कब ढल जाती है शाम....

रात फिर कराती है ,
मुझे मेरे होने का अहसास....

फिर भर जाती हूँ ऊर्जा से,
एक नए दिन का सामना करने के लिए ....

फिर हो जाती हूँ तैयार,

अपने अलावा सभी के लिए जीने को....

सदियों से चलता आ रहा है,
मेरा ये नियमित और बेरहम जीवनचक्र ....

उम्मीद में एक खुशनुमा सवेरे की,
हंसते-हंसते  सारे दुख सह  लेती हूँ ....

और एक दिन 'मेरा वक़्त भी बदलेगा' 
सुख की ये आस लिए बेवक्त चली जाती हूँ ..    
...............................................................   ममता



Thursday, December 10, 2015

महानगर...

सरपट भागती ,
न जाने क्या तलाशती ,
एक दुसरे को धकियाती ,
नोचती , खसोटती,
लुटती,पिटती,
शोर मचाती 
पान चबाती,
खांसती, खंखारती,
इधर उधर थूकती,
दीवारों को गन्दा करती,
धुंआ उड़ाती ,
गंद फैलाती,
सिर्फ खुद के लिए सोचती,
चौतरफा है एक भीड़,

कौन हैं ये लोग ?
कहाँ से आ रहे हैं ?
कहाँ को जायेंगे ?
क्या होगा हमारा ?
किस चीज के पीछे भाग रहे हैं हम ?
कब तक चलेंगे हम इस तरह ?
कब तक बचेगा हमारा अस्तित्व..?

बहुत सारे  सवाल मेरे,
जहन को झिंझोड़ने लगते हैं ,
घबरा कर मैं आँखे बंद कर लेती हूँ,
फिर ख्याल झटक देती हूँ,
और चल पड़ती हूँ ,
आगे  निकलने की होड़ में
उसी भीड़ का एक हिस्सा बनने .....
................................................ममता





Wednesday, November 25, 2015

मन की उड़ान......

सोचती हूँ पर्वत बन जाऊं ,
अविचलित,अखंड , आकर्षक ,
धवल सफेद, 
आसमान को छूते पर्वत ,
तूफानों का  रुख मोड़ दूं ,
और
आसमान से सितारे  चुराकर,

प्यासी धरती में,
धीरे धीरे प्यार से बिखरा दूं .....


                                    
सोचती हूँ,पंछी बन जाऊं   ,
अनासक्त, तटस्थ,
बंधन से मुक्त ,
उम्मीदों से दूर,
कोई पहचान नहीं,
किसी की यादों में भी नहीं, 
पेड़ों की डालियों में झूलती,
खुले आसमान के नीचे, 
सितारों से बातें करती,
शाम की गुनगुनी हवाओं में गोते लगाऊं,
इधर से उधर,बस उन्मुक्त उड़ती रहूँ ....
 

सोचती हूँ नदी बन जाऊं... 
अपने विस्तार को पाने के लिए,
पत्थरों चट्टानों से टकराती ,
खुद अपनी राह बनाती ,
कभी शांत कभी तेज़ ,
इठलाती इतराती ,  
संगीतमयी कलकल करती,
अनवरत बहती जाऊं,  
सुनहरी घाटियों में दौड़ लगाऊँ ,   
और अनंत सागर में एकाकार हो जाऊं ....
 ...........................................................mamta