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खुशियों का पिटारा..

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आज मैंने बचपन का पिटारा खोला, बड़ा ही अनमोल था वो खजाना खोला, पुराना कुछ सामान यादों की तह खोलता, मुझको वापस अपने प्यारे बचपन से जोड़ता, गोल गोल छेद वाले कुछ पुराने सिक्के, कुछ पुराने टिकट इक डायरी में चिपके, कुछ फूल पत्ते जो मैंने तब सुखाये थे , ख़ुशी के वो पल जो बचपन में चुराए थे, डायरी में लिखी चंद शायरी और गजलें... कुछ पुराने स्टीकर बबल गम में निकले, रंग बिरंगे कंचे , शंख और सीपियाँ , मोतियों से भरी छोटी सी एक डिबिया, और न जाने कितनी यादें हुयी ताज़ा, माँ की कहानियां और कितने रानी राजा, आज बड़े की चाह में छोटा सुख हमे नहीं भाता, बचपन सा जीना हमें अब क्यों नहीं आता...                                                                              mamta                                     ...

इंतज़ार...

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धीरे धीरे जिंदगी के सभी रंग फीके हो गए , पर यादों के रंग आज भी सजीव हैं  , वो रंग  जो भरपूर जिए थे तुम्हारे साथ, सब सहेज कर रखे हैं मैंने ,   लाल रंग  तुमने कहा था हमारे  दिल का प्रतीक है, ये फीका न पड़े , उससे मैंने आज तक अपनी यादों की  मांग सजा रखी है .. सुनहरा रंग , तुमने कहा था साथ धड़कती हमारी धडकनों का है , उसे मैंने आज तक सहेजा है अपनी याद का बिछौना बना कर.. नीला रंग  आकाश की तरह असीमित हमारे प्रेम का, आँखों में सहेजा है मैंने अश्रु बना कर.. और हरा रंग तुमने कहा था निशानी है हमारी हरी भरी मोहब्बत की , उससे मैंने  आज तक यादों की,  मखमली घास बिछा रखी है .. की तुम कभी तो आओगे लौट कर , ये रंग करेंगे तुम्हारा स्वागत, और फिर हो उठेंगे जीवंत..                                                            mamta

बेटियां...

दुआ करते हैं बेटे की और , हो जाती हैं बेटियां, बड़ी जीवट होती हैं ये, यूं ही पल जाती हैं बेटियां| चौका बर्तन करती,घर में, पढ़ लिख जाती है बेटियां, सु ख सुविधाएँ बेटों को , पर आगे निकल जाती हैं बेटियां | जन्मदायिनी हैं फिर भी, मारी जाती हैं बेटियां , कभी लालच कभी वासना की, बलि चढ़ जाती हैं बेटियां | रुलाते हैं जब बेटे ,, आंसू पोछती हैं बेटियां, नफरत पाकर भी, सिर्फ प्यार लुटाती हैं बेटियां| कडककड़ाती ठण्ड में, सुहानी धूप होती हैं बेटियां , मानो या न मानो , भगवान् का वरदान होती है बेटियां ...                                                                                    mamta

आस्था....

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कैसी कैसी लीला दिखाते हो , अलग अलग नामों से प्रकट हो जाते हो , मगर सुनो तो ज़रा प्रभु जी , हम हैं तुम्हारे तुम जानते हो,  फिर ये लुकाछिपी का खेल क्यों दिखाते हो , सुना है तुम एक पुकार में दौड़े चले आते हो , फिर हमें अपने दरश क्यों नहीं कराते हो ? अब तुम्हें खुद आना ही पड़ेगा, अपना बचन निभाना ही पड़ेगा, वरना तुम्हारे भक्त रूठ जायेंगे , आस्था में प्रश्न चिन्ह लगायेंगे, अब और कितना तड़पाओगे कुछ तो बताओ प्रभु कब आओगे ...??                                                        mamta my 1st Glass painting dedicated to Ganesh jee

उड़ान...

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कभी कभी सोचती हूँ, पंछी बन जाऊं   , अनासक्त, तटस्थ, बंधन से मुक्त , उम्मीदों से दूर, कोई पहचान नहीं, किसी की यादों में भी नहीं,  पेड़ों की डालियों में झूलती शाम की गुनगुनी हवाओं में गोते लगाऊं, खुले आसमान के नीचे,  सितारों से बातें करती, इधर से उधर, बस उन्मुक्त उड़ती रहूँ , में चाहती हूँ  पंछी बन जाऊं ...                                 ...mamta 

बांवरा मन !!

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क्यों चंचल है ये मन..? क्यों भागता है ये मन? क्यों ठहरता  नहीं है तू , क्यों समझता नहीं है तू... घूमता है यादों में भूत की  ... उड़ता है सपनों में भविष्य के ... रोता है उस पर जो चला गया... पकड़ना चाहता है उसे जो तेरा है ही नहीं.... क्यों जीता नहीं इस पल को जो तेरे साथ है? अनदेखी  करता है वो ख़ुशी जो तेरे आसपास है.. बीते हुए कल  में है, न आने वाले कल में है  .. ख़ुशी तो बस वर्तमान के इस सुनहरे पल में है... क्यों ठहरता  नहीं है तू , क्यों समझता नहीं है तू...  ...mamta                                                            

तृष्णा...

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मानव मन की चाह,  सीमित हो पायेगी कभी ? शायद कभी नहीं!! आकर्षित हो मन , भागता है किसी की ओर  , थिरकती है तृष्णा , जब तक पा न ले उसे , अधिकार में न ले ले अपने, मिल जाये जिस छण, फिर अतृप्त , फिर भटकने लगता है , खोजने  कुछ नया , जो तृप्त कर सके मन को, सोचो आज मानव कितना सुखी होता, तृष्णा भरे जीवन को तृप्ति से अगर जीता |                                                     ...    mamta                                                                                                                           ...