कोशिश...

मै भी पकड़ना चाहती हूँ उसे ..
दूर क्षितिज मे जैसे सूरज की किरणे करती हैं,
धरती को पकड़ने की कोशिश..
पर मेरी मजबूरी है ,
नहीं पकड़ पाती मै...
बस ये सोच कर खुश हूँ की
उसे छू तो लिया पूरा ,
भर दिया अपनी गर्माहट से..
भले ही शाम होते होते लौट जाउंगी मै भी,
अपना अस्तित्व समेट कर वापस चली जाउंगी,
उन किरणों की तरह...... 
                              ...   mamta

Comments

  1. आपकी यह रचना कल मंगलवार (बृहस्पतिवार (06-06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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    1. धन्यवाद अरुण जी मेरी रचना को ब्लॉग प्रसारण में शामिल करने के लिए...

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  2. धन्यवाद अरुण जी...

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  3. क्या बात है ... बहुत सुंदर

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    Replies
    1. धन्यवाद वर्मा जी ....

      Delete
  4. बहुत सुंदर !!

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